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मैत्रिय प्रोजेक्ट: रोजगार का ऋजन करेगा या किसानों को बेघर?

Posted On: 18 Apr, 2017 social issues में

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The Maitreya Buddha Project Kushinagar Uttar Pradesh India

कुशीनगर….शांति का उपदेश देेने वाले गौतम बुद्ध की नगरी। कुशीनगर की धरती पर गौतम बुद्ध को परिनिर्वाण प्राप्त हुआ था। बौध धर्म में कुशीनगर का विशेष महत्व है। इसका अंदाजा आप इस बात से ही लगा सकते हैं कि बौध धर्म का हर अनुयायि मरने से पहले एक बार कुशीनगर की धरती पर जरुर आना चाहता है। कुशीनगर की भारत से ज्यादा विदेशो में ख्याती है। इसे और विशेष और महत्वपूर्ण बनाने के लिए यहां मैत्रिय परियोजना का प्रस्ताव रखा गया। साल 2013 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कुशीनगर में मैत्रिय परियोजना की नींव रखी। उस कार्यक्रम में तिब्बती धर्म गुरु दलाई लामा भी आए हुए थें। विकास का जो पथ तैयार किया गया था, उसमें से सिवाय उस नींवे के कुछ भी आगे नहीं बढ़ा…

खैर बात अगर मैत्रिय परियोजना की करें, तो इस परियोजना के तहत बुद्ध की 500 ft मूर्ति बनेगी। इसके अलावा विश्वविध्यालय, मेडिटेशन सेंटर, अस्पताल आदि…चीजें इस मैत्रिय परियोजना में प्रस्तावित है। कहा जा रहा  है कि इस परियोजना से रोजगार के अवसर बनेंगे। आस-पास के लोगों को रोजगार के साथ-साथ उपचार और शिक्षा का भी बेहतर ऑप्शन मिलेगा। खैर इसमें दो राय नहीं कि मैत्रिय परियोजना से क्षेत्र का विकास होगा और रोजगार के अवसर बनेगें। सवाल ये है कि क्या वो विकास और रोजगार के वो अवसर जरुरत मंदो मिलेगा? क्योंकि मैत्रिय परियोजना के तहत लंबित ये सभी चीजें हाई-प्रोफाइल हैं। और जैसा कि उस क्षेत्र का हाल है या फिर जितना हमने क्षेत्र के लोगों को जाना है, लोग हाई-प्रोफाइल चीजें देखकर उसमें घुसने से पहले कई बार सोचते हैं। तो जाहिर सी बात है, उन अस्पतालों विश्वविध्यालय आदि में अपनों को दाखिला कराने से पहले भी एक बार जरुर सोचेंगे और अपना बटुआ जरुर टटोलेंगे।

इस परियोजना के क्रियान्वित होने के लिए करीब  660 एकड़ जमीन की दरकार है। इसमें आसपास के किसानों की उपजाऊ खेती की जमीन भी आती रही है। जिसे लेकर किसानों ने विरोध प्रदर्शन भी किया। लेकिन शायद मुआवजे की राशी के आगे वो प्रदर्शन ठंडा हो गया। हालांकि राज्य सरकार ने इस परियोजना के लिए 275 एकड़ जमीन उपलब्ध करा दी है। सवाल ये है कि क्या जमीन के बदले किसानों को जो मुआवजा दिया जा रहा है उससे किसनों की आगे की पीढ़ी अपनी रोजी-रोटी का जुगाड़ कर लेगी? क्या उस ऊपजाउ जमीन पर बनने वाली इमारत या उस मूर्ती पर कोई फसल उगेगी?

आस्था की दृष्टी से देखें तो उसके लिए भगवान की भव्य मूर्ती या मंदिर की जरुरत नहीं है। छोटे मंदिर में जाते समय भी इंसान के मन में भगवान के प्रति वही आस्था रहता है, जो किसी भव्य और सुसज्जित मंदिर में जाते समय होती है। इन सबसे उपर जो चीज है वो है इंसान की भूख…और उसे मिटाने के लिए जमीन पर इमारत की जगह फसल उगाना जरुर है। ताकी इस पीढ़ी के भोजना बंदोबस्त तो ही साथी ही उसकी अगली पीढ़ी भी खेती करके अपना पेट पाल सके।




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