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हड़ताल और दंगो की तरफ बढ़ता हर कदम, देश को एक कदम पीछे ले जाता है...

Posted On: 16 Jun, 2017 Social Issues में

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saharanpur-File-PTI

पिछले एक साल से एक चीज नोटिस कर रहा हूं और वो है कि देश में इन दिनों हड़ताल, प्रदर्शन और दंगों आदि में कुछ ज्यादा ही इज़ाफा हुआ है। इससे देश का कोई भी हिस्सा अछूता नहीं है। चाहे भारत देश का मुकुट कहा जाने वाला जम्मू-कश्मीर हो या दक्षिण भारत। हिंसा ने हर हिस्से को अपने चपेट जरुर लिया है। वादि-ए-कश्मीर में  बुरहान वानी के मारे जाने के बाद से भड़की हिंसा आज तक खत्म नहीं हुई, उस हिंसा की आग रहृ-रहकर वादि-ए-कश्मीर को सुलगाती रहती है और वहां की अमन चैन में नफरत और अलगाववादी का धुंआ फैलाती रहती है।

ऊपर से नीचे की तरफ बढ़ते हुए देखा जाए तो हरियाणा भी जाट आरक्षण आंदोलन जैसी भयानक आंदोलन को देख चुका है। आंदोलन की इस आग  में न जाने  कितने माताओं के आंचल सूने कर दिए। आरक्षण की उस धधकी आग में किसी का भाई जला तो किसी का बेटा।  इस आग ने हरियाणा को एक ऐसी तपिश दे दी जिसे शायद  हरियाणा कभी नहीं भुला पाएगा।

देश की राजधानी दिल्ली…यूं तो दिल्ली में दंगे होता नहीं देखा मगर हां दंगो की कोर कसर यहां होने वाले हड़ताल ने पूरी कर दी है। चाहे वो जंतर मंतर पर कर्नाटक के किसानों का धरना हो या आरक्षण को लेकर जंतर मंतर पर जाटों की कूच। जैसे यूपी और बिहार से लोग यहां रोजगार के लिए आते हैं। वैसे राजनेता और अन्य लोग यहां धरना देते आते हैं। धरने के मामले में राजधानी का कोई तोड़ नहीं।

अब बात करते हैं देश की राजनीति तय करने वाले प्रदेश यानि कि उत्तर प्रदेश की।  यहा ंके लोग राजनीति में कुछ ज्यादा ही रुचि रखते हैं। गली नुक्कड़ हर जगह आपको राजनीतिक बातें सुनने को मिल जाएंगी। शायद यही वजह है कि यहां दंगों के बीच राजनीति कुछ ज्यादा ही की जाती है। बुलंदशहर में हाइवे पर रेप हुआ तो राजनीति , सहारनपुर में दंगा हुआ तो एक से बढ़कर एक राजनेता दंगो की आग में अपनी रोटिंयां सेंकने लगे। रामपुर में युवती को छेड़ने का वीडियो वायरल होने के बाद उस पर भी राजनैतिक रोटियां सेंकी जाने लगी। योगी सरकार के आने के बाद लोगों को उम्मीद जगी की कानून व्यवस्था सुधर जाएगी। लेकिन वो भी चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात वाली बात हो गई।

उग्र भीड़ की बेहद खौफनाक कहानी पिछले महीने झारखंड से सामने आई। जहां एक शख्स को भीड़ ने पीट-पीटकर मौत के घाट उतार दिया। वो भी सिर्फ इस लिए कि लोगों को शक था कि उक्त शख्स बच्चा चोर है। भीड़ ने आव देखा न ताव युवक पर भेंड़िये की तरह झपट पड़ी और उसे पीट-पीटकर मौत के घाट उतार दिया। इस दौरान वो शख्स रहम की भीख मांगता रहा, चिल्लता रहा कि मैं बच्चा चोर नहीं हूं लेकिन भीड़ के आगे भला किसी की चली है जो उसकी चलती। अंततः भीड़ ने उसे मौत के घाट उतार दिया।

भारत का हृदय कहा जाने वाला मध्य प्रदश पिछले कुछ दिनों से हिंसा की आग में धधक रहा है। कर्ज माफी को लेकर धरने पर बैठे किसानों पर गोलियां चलाई गई जिसमें एक छात्र सहित 5 किसानों की मौत हो गई। उसके बाद तो जैसे मध्यप्रदेश में हिंसा की आग ज्वाला बन गई। हर दिन प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों से आगजनी की खबरें सामने आने लगी। इस दौरान इंटरनेट सेवा पर भी रोक लगा दिया गया। किसानों को मनाने के हर संभव प्रयास किए गए। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश में शांति के लिए उपवास भी रखा। तो विपक्ष ने इस दंगे को अपना हथियार बनाकर प्रदेश सरकार पर वार करना शुरु कर दिया। और फिर इस आग में राजनीतिक रोटियां सिंकने लगी।

पिछले साल कावेरी के जल ने ऐसी आग लगाई कि कई दिनों तक इस आग में आंद्र प्रदेश और कर्नाटक जलते रहें। आंद्र में कर्नाटक के लोगों को निशाना बनाया जा रहा था तो कर्नाटक में आंद्र वासी हिसा का शिकार हो रहे थें। अंद्रप्रदेश में एक बस डीपो को आग के हवाले कर दिया गया जिसमें दर्जनों बसें जलकर स्वाहा हो गई । कावेरी का ये मुद्दा  सड़क से लेकर पटरियों तक उठी। कहीं गांड़ियां फूंकी गई तो कहीं रेल रोका गया।  इन सबके बीच दोनो ही प्रदेश महीनों तक कावेरी की आग में जलते रहे। और लोग सहमें सहमें से जीने लगे। हांलकि कुछ दिनों बाद फिर माहौल शांत हुई औऱ जिंदगी पटरी पर आ गई।

हाल ही में केरल में कांग्रेस द्वार आयोजित की गई बीफ पार्टी ने केरल के साथ-साथ पूरे देश में बवाल मचा रखा था। कोई इसे अपना अधिकार बता रहा था तो कोई जबरदस्ती थोपा जाने वाला नियम। इस बात को लेकर एक बार फिर सदियों पुरान द्रविणआंचल का मुद्दा ट्वीटर पर ट्रेंड कर रहा था। दक्षिण भारतीय लोग पूर जोर से इसका समर्थन कर रहे थें। एक तरह से कह सकते हैं कि दक्षिण और उत्तर के बीच एक क्षद्म युद्ध जैसा है।

हड़ताल, दंगे चाहे देश के किसी भी हिस्से में हो, लेकिन वो  देश की कमर जरुर तोड़ता है। दंगों में बढ़ने वाला हमारा प्रतेयक कदम देश को एक कदम पीछे ले जाता है। समस्या का समाधाना दंगा या हड़ताल नही है। उसका निराकरण है, सोचो यदि हर कोई हड़ताल या दंगा करने पर उतारु हो जाए तो भला आपकी या हमारी सुनने वाला कौन रह जाएगा। किससे शिकायत करोगे और किससे सुरक्षा मांगोगे और कबतलक उजड़े घर को बनाते रहोगे।….



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
June 17, 2017

उपाय भी बताइये … अच्छे दिन में तो यह सब होना ही नहीं चाहिए था.

ravichandra के द्वारा
June 17, 2017

दिक्कत तो यही है कि हम हर चीज के लिए दोष सरकार का ही देते हैं और उसी से समस्या के हल की आस करते हैं।….जबकि यदि हम चाहें तो उसका निवारण शांति से किया जा सकता है। देखिये सर आप उम्र औऱ तजुर्बे में हमसे बड़े हैं…आप ही बताइये क्या हड़ताल और दंगे देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित नहीं करते??

jlsingh के द्वारा
June 19, 2017

प्रिय रविचंद्र जी, सरकार पूरी तरह से दोषी है. शांतिपूर्ण आंदोलन को भाव नहीं दिया जाता है. जब आंदोलन उग्र होता है तब नींद खुलती है. दोनों पक्ष के नेता अपनी अपनी अपनी रोटी सेंकते हैं यह मैं आज से नहीं देख रहा हूँ. पहले भाजपा करती थी आज दूसरे विपक्षी दल कर रहे हैं. जंतर मटर पर शांतिपूर्ण आंदोलन करनेवाले को नाटक कमपनी का कलाकार बताया गया. उनसे कोई भी दल का सम्मानित नेता मिलने तक नहीं गया. हम अच्छी तरह जानते हैं की सरकारी संपत्ति का नुकसान मतलब देश का नुकसान जिसकी भरपाई आम जनता ही करती है. कोई भी आम आदमी लूट पात या दंगा फसाद नहीं करता. इसके पीछे किसी न किसी बड़ी हाश्ती का हाथ होता है. बाकी आपको भी सब समझ में आने लगेगा.

ravichandra के द्वारा
June 19, 2017

आदरणीय आप सभी के ज्ञान और अनुभव से हमे बहुत कुछ सीखने का मौका मिल रहा है….हां अपनी बौधिक क्षमता के मुताबिक हमने जो देखा-सुना और महसूस किया उसे साझा कर दिया…बाकि आगे बहुत कुछ सीखना है हमें……. हां ये दुख है कि जिन्हें हम जिन्हें सर आखों पर चढ़ा कर देश की बागडोर सौपते हैं , वो भी अंदोलन में अपनी रोटियां सेकने में व्यस्त हो जाता है चाहे वो कोई भी सरकार हो……समस्याओं का निवारण कम उसे उल्झाया ज्यादा है….और हम उसे समझ नहीं पाते। किसी ने छोपड़ी में बैठकर दो रोटी क्या खा ली वो हमें सबसे बड़ा हितैशी लगता है।….


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